Khelo India News| Women in Sports: भारत आज विश्व पटल पर एक ‘स्पोर्ट्स सुपरपावर’ बनने की राह पर अग्रसर है। ओलंपिक से लेकर पैरालंपिक तक, हमारे खिलाड़ी तिरंगे का मान बढ़ा रहे हैं। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक ऐसा कड़वा सच छिपा है, जो खेल जगत की साख पर गहरे सवाल खड़े करता है। हाल ही में खेल मंत्रालय द्वारा लोकसभा में जारी किए गए आंकड़ों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। जिन कोचों और स्टाफ पर खिलाड़ियों को निखारने और उन्हें सुरक्षा देने की जिम्मेदारी है, उन पर ही यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं। सवाल यह है कि क्या हमारा खेल तंत्र भीतर से खोखला हो चुका है? खेलो इंडिया न्यूज़ की इस विशेष रिपोर्ट में हम उस सच का खुलासा करेंगे जो व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है।
Safety of Women in Sports: लोकसभा में खुलासा: 10 साल, 33 शिकायतें और टूटता भरोसा
संसद के हालिया सत्र में सांसद अधिकारी दीपक देव और राजा राम सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में खेल मंत्री मनसुख मंडाविया ने जो आंकड़े पेश किए, वे डराने वाले हैं। पिछले 10 वर्षों में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के स्टाफ और कोचों के खिलाफ यौन उत्पीड़न की कुल 33 शिकायतें दर्ज की गई हैं।
यह महज एक संख्या नहीं है, बल्कि उन 33 खिलाड़ियों का चीखता हुआ दर्द है, जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए मैदान में उतरे थे, लेकिन उन्हें वहां शोषण का सामना करना पड़ा। एक खिलाड़ी के लिए उसका कोच ‘गुरु’ और ‘मार्गदर्शक’ होता है, लेकिन जब वही रक्षक भक्षक बन जाए, तो खेल की पूरी बुनियाद हिल जाती है।
कोच और स्टाफ: आंकड़ों का डरावना विश्लेषण
जब हम इन 33 शिकायतों का बारीकी से विश्लेषण करते हैं, तो सिस्टम की एक भयावह तस्वीर सामने आती है:
- प्रशासनिक स्टाफ: कुल 33 में से 8 मामले प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ थे।
- कोच (प्रशिक्षक): सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि 25 शिकायतें सीधे कोचों के खिलाफ दर्ज की गई हैं।
भारतीय संस्कृति में ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा को पवित्र माना गया है। खिलाड़ी अपने माता-पिता से ज्यादा समय अपने कोच के साथ बिताते हैं। ऐसे में कोचों के खिलाफ शिकायतों का इतना बड़ा हिस्सा होना यह दर्शाता है कि सत्ता और पद का दुरुपयोग किस स्तर पर हो रहा है।
कार्रवाई या सिर्फ खानापूर्ति?
आंकड़ों के मुताबिक, कार्रवाई की प्रक्रिया भी काफी धीमी और पेचीदा रही है। प्रशासनिक स्टाफ के अधिकांश मामलों को बिना किसी बड़ी सजा के बंद कर दिया गया, हालांकि एक मिसाल के तौर पर एक आरोपी की पूरी ग्रेच्युटी हमेशा के लिए रोक दी गई। लेकिन कोचों के मामले में स्थिति और भी जटिल है:
- सेवा समाप्ति (Termination): केवल 2 कोचों को सेवा से बर्खास्त किया गया।
- निलंबन (Suspension): 6 कोचों को निलंबित किया गया।
- मामूली दंड: 6 कोचों को हल्की चेतावनी या छोटे दंड देकर छोड़ दिया गया।
- लंबित अपील: सबसे बड़ी बाधा यह है कि 8 मामलों में आरोपियों ने फैसले के खिलाफ अपील कर दी है, जिससे जांच की प्रक्रिया अंतहीन खिंचती जा रही है और पीड़ित खिलाड़ी को न्याय मिलने में देरी हो रही है।
सिस्टम के ‘लूपहोल्स’ और चुनौतियां
खेल मंत्रालय का तर्क है कि मंत्रालय के सीधे अधिकारियों के खिलाफ कोई शिकायत नहीं मिली है और सभी नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशंस (NSFs) के लिए ‘पॉश एक्ट’ (POSH Act) का पालन करना अनिवार्य है। लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
सबसे बड़ी समस्या ‘स्वायत्तता’ (Autonomy) की है। फेडरेशंस खुद को स्वतंत्र निकाय मानती हैं, जिससे मंत्रालय का सीधा हस्तक्षेप कम हो जाता है। इसके अलावा, मंत्रालय के पास व्यक्तिगत फेडरेशंस की शिकायतों का कोई केंद्रीय डेटाबेस मौजूद नहीं है। खिलाड़ियों में जागरूकता की भारी कमी है; उन्हें अक्सर यह पता ही नहीं होता कि आंतरिक शिकायत समिति (ICC) तक कैसे पहुँचा जाए। सबसे दुखद पहलू यह है कि करियर खत्म होने के डर और सामाजिक बदनामी के भय से अधिकांश खिलाड़ी चुप्पी साध लेते हैं।
समाधान: ‘केंद्रीकृत पोर्टल’ और सख्त जवाबदेही
खेलो इंडिया न्यूज़ का मानना है कि सिर्फ कमेटियां कागजों पर बनाने से बदलाव नहीं आएगा। हमने इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए सरकार को कुछ ठोस सुझाव प्रस्तावित किए हैं:
- केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल (Centralized Portal): शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को फेडरेशन के प्रभाव से मुक्त किया जाना चाहिए। एक ऐसा पोर्टल हो जो सीधे खेल मंत्रालय (MYAS) के अधीन हो, ताकि फेडरेशन के पदाधिकारी शिकायतों को दबा न सकें।
- मंत्रालय की ‘वॉचडॉग’ भूमिका: फेडरेशन भले ही जांच करे, लेकिन उसकी निगरानी मंत्रालय द्वारा की जानी चाहिए। जांच की अंतिम रिपोर्ट पर मंत्रालय की संतुष्टि अनिवार्य हो।
- गोपनीयता और समय सीमा: पीड़ित खिलाड़ी की पहचान तब तक पूरी तरह गुप्त रखी जाए जब तक आरोप सिद्ध न हो जाएं। साथ ही, जांच के लिए 30 से 45 दिनों की एक सख्त समय सीमा तय की जाए।
- नेशनल ब्लैकलिस्ट डेटाबेस: जो कोच या स्टाफ दोषी पाए जाएं, उनका नाम एक राष्ट्रीय डेटाबेस में डाला जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि एक जगह से बर्खास्त होने के बाद वे किसी दूसरे राज्य या निजी अकादमी में दोबारा नौकरी न पा सकें।
निष्कर्ष
भारत को खेलों की महाशक्ति बनाने का सपना तब तक अधूरा है, जब तक हमारे खिलाड़ी मैदान पर खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे। सरकार ‘नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल 2025’ पर काम कर रही है, जो एक सराहनीय कदम है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि नियमों को केवल फाइलों तक सीमित न रखकर उन्हें मैदान पर कड़ाई से लागू किया जाए। खिलाड़ियों की सुरक्षा ही भारतीय खेलों की असली साख है।
















